Wednesday, 29 July 2020

*कोरोना काल और अंधविश्वास का खेल*


*कोरोना काल और अंधविश्वास का खेल*

जबरीमल्ल पारख

कोरोना वायरस एक महामारी है जो लोगों के बीच दैहिक संपर्क में आने से फैलती है। पिछले छह महीने से यह दुनिया के लगभग सभी देशों में फैल चुकी है, कहीं कम और कहीं ज़्यादा। चूंकि यह नया वायरस है, इसलिए अभी इसकी कोई निश्चित दवा और रोकथाम के लिए टीके की खोज नहीं हो पाई है। यह एक संक्रामक बीमारी है, लेकिन उतनी खतरनाक नहीं है जितनी प्लेग या हैज़ा। यह कैंसर, टीबी और डेंगू से भी अपेक्षाकृत कम खतरनाक है, जिनसे हर साल भारत में ही लाखों लोग मारे जाते हैं। लेकिन संक्रामक होने के कारण कोरोना का फैलाव बहुत तेज़ी से हुआ है। अभी तक का अनुभव यही बताता है कि संक्रमित होने वाले सौ लोगों में से लगभग 70-80 लोगों में इसके लक्षण प्रकट ही नहीं होते और जिन 20-30% मरीज़ों में इसके लक्षण दिखते हैं, उनमें से भी गंभीर रूप से बीमार मरीज़ 10 से ज़्यादा नहीं होते और उनमें से 3 से 5 मरीज़ मर जाते हैं, खासतौर पर वे जो पहले से किसी अन्य बीमारी से गंभीर रूप से पीड़ित होते हैं। अगर सभी मरीज़ों को समय पर इलाज मिल जाता है, तो मरने वालों की संख्या और कम की जा सकती है। इस संबंध में जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात
है, वह यही कि यह एक बीमारी है और निश्चित दवा की खोज न हो पाने के बावजूद पहले से उपलब्ध दवाओं आदि के द्वारा मरीज़ों को बचाया जा रहा है। इसी तरह संक्रमण न हो, उसके लिए विज्ञान द्वारा बताए तरीकों का पालन करते हुए महामारी से बचा जा सकता है।

जब से कोरोना वायरस का प्रकोप हुआ है तब से कई तरह की भविष्यवाणियां और टोने-टोटके भी चल रहे हैं। इस महामारी ने "धर्म बनाम विज्ञान" को लेकर बहस भी छेड़ दी है। विज्ञान में यकीन करने वालों को धर्म और अंधविश्ववासों की आलोचना करने का एक ठोस कारण मिल गया है। यह और बात है कि धर्म में यकीन करने वालों की आस्था और (अंध)विश्वास में कोई कमी आई हो, या वे विचलित हुए हों, ऐसा प्रतीत नहीं होता जबकि दुनिया भर में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च आदि या तो बदं हो गए हैं या सुनसान पड़े हैं। ईश्वर और धर्म में आस्था रखने वाले लोग भी कोरोना वायरस के डर से घर में दुबके बैठे हैं। लेकिन दूसरी ओर, टीवी चैनलों या व्हाट्सअप के माध्यम से कुछ ज्योतिषी तरह-तरह के दावे भी कर रहे हैं, तो कोरोना को भगाने के लिए जगह-जगह कई तरह के टोने-टोटके भी शुरू हो गए हैं।

एक ज्योतिषी ने दावा किया था कि इस तरह के वायरस का उल्लेख हज़ारों साल पहले लिखे गए ग्रंथ ‘नारद संहिता’ में है जिसके अनुसार यह इस साल (2020) के जनवरी से मार्च तक अपने चरम पर रहेगा और 25 मार्च के बाद इसका प्रकोप कम होता जाएगा और अप्रैल के मध्य तक जाते-जाते खत्म हो जाएगा। ज़ाहिर है कि ‘नारद संहिता’ के जिस श्लोक से इसे जोड़ा जा रहा है, वह ‘नारद संहिता’ में है भी या नहीं और अगर है तो इसका ठीक यही अर्थ है, इसकी न कोई जांच की गई है और न की जाएगी। इस तरह की भविष्यवाणियों का दिलचस्प पहलू यह है कि ऐसे दावे घटना घटित होने के बाद किए जाते हैं। आज तक ऐसी कोई भी भविष्यवाणी घटना घटित होने से पहले नहीं की गई और की गई तो वह पूरी तरह से मिथ्या साबित हुई। जब नेहरू जी प्रधानमंत्री थे, तब ज्योतिषियों ने यह फैलाया कि नौ ग्रह पहली बार एक ही पंक्ति में आ रहे हैं और इससे प्रलय आएगी और  दुनिया नष्ट हो जाएगी। नतीजा यह हुआ कि ग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए जगह-जगह यज्ञ-हवन होने लगे। भजन-कीर्तन और व्रत-उपवास बढ़ गए। मंदिरों और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने की रफ़्तार बढ़ गई। इस अफ़वाह से पैदा हुए डर को समाप्त करने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री नेहरू को लोगों से अपील करनी पड़ी कि वे ऐसी बातों पर ध्यान न दें, ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है। लेकिन लोगों ने उन पर यकीन नहीं किया और प्रलय का इंतज़ार करते रहे। लेकिन जब बताई गई तारीख निकल गई और प्रलय तो दूर की बात है, हल्का सा भूकंप तक नहीं आया, तब ही लोगों ने माना कि हां वे प्रलय से बच गए हैं। साफ़ था कि भविष्यवाणी पूरी तरह से मिथ्या थी। लेकिन इसके बावजूद लोग इस तरह की
भविष्यवाणियों पर यकीन करना नहीं छोड़ते। इस बार भी जून-जुलाई में एक माह के अंदर तीन-तीन ग्रहण होने को ऐसी ही चमत्कारी घटना माना जा रहा है और इसे भी कोरोना महामारी से जोड़ा जा रहा है।

कोरोना वायरस के महामारी का रूप ले लेने के बाद से ही यह दावा किया जा रहा है कि इसकी भविष्यवाणी तो हज़ारों साल पहले हो गई थी। अगर ऐसा था तो पहले क्यों नहीं बता दिया गया ताकि दुनिया भले ही सचेत न होती, हिन्दुस्तान तो सचेत हो जाता और इस महामारी से बचने के उपाय समय रहते कर पाता। ‘नारद संहिता’ के आधार पर जो कहा जा रहा है, उसके लिए किसी ज्योतिषशास्त्र के ज्ञान की ज़रूरत नहीं है और ज्योतिषियों ने भी मौसम के बदलाव संबंधी एक सामान्य ज्ञान का इस्तेमाल किया है और उसे ज्योतिष की भाषा में पेश कर लोगों को बरगलाने का काम किया है। इसे और भी विश्वसनीय और चमत्कारी बनाने के लिए ‘नारद संहिता’ का हवाला दिया गया है, ताकि धर्मभीरू 
हिन्दू जनता बिना कोई सवाल उठाए इसे सच मान ले। भविष्यवाणी का जो रूप गढ़ा गया है, वहां यह मानकर चला जा रहा है कि गर्मी के साथ वायरस का असर कम होगा ही, तो बाद में यह दावा किया जा सकेगा कि देखिए हमारी भविष्यवाणी सच निकली और इस तरह ज्योतिष का हमारा धंधा और ज़ोर-शोर से चल निकलेगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो जैसा ज़्यादातर भविष्यवाणियों के साथ होता है, लोग-बाग इस भविष्यवाणी को भी भूल जाएंगे और कोई आकर उनकी गर्दन नहीं पकड़ेगा कि उनके द्वारा की गई भविष्यवाणी झूठ क्यों निकली। विडंबना यह है कि यह वायरस 56° तापमान पर भी सक्रिय रह सकता है।

इस तरह की भविष्यवाणियों में ज्योतिषी की अपनी लोकप्रियता भी लोगों को गुमराह करने में भूमिका निभाती है। प्रख्यात ज्योतिषविद बेजान दारूवाला ने भी नक्षत्रों की गणना करके दावा किया कि कोरोना का प्रकोप 21 मई तक समाप्त हो जाएगा। 21 मई आई और चली भी गई, लेकिन कोरोना न तो समाप्त हुआ और न ही इसका प्रकोप कम हुआ, बल्कि और बढ़ गया। बेजान दारूवाला जिस शहर अहमदाबाद में रहते थे, वह शहर कोरोना की भयंकर चपेट में आ गया था।अहमदाबाद में मरने वालों की संख्या किसी और शहर की तुलना में सबसे ज़्यादा थी। त्रासदी यह रही कि स्वयं बेजान दारूवाला भी इस महामारी की चपेट में आने से अपने को बचा न सके और 29 मई को उनकी मृत्यु हो गई। 

विडंबना यह है कि हमारा पूरा जीवन धार्मिक रीति-रिवाज़ों और रूढ़ियों से इतना जकड़ा हुआ है कि जन्म के पहले से लेकर मृत्यु के बाद तक उनसे मुक्ति नहीं मिलती। बच्चा पैदा होते ही सबसे पहले यह देखा जाता है कि वह किस घड़ी और किस क्षण में पैदा हुआ है। उस समय कौन से नक्षत्र कहां अवस्थित हैं। उसी के अनुसार जन्मपत्री बनाई जाती है और ज़िंदगी-भर वही जन्मपत्री ही उस बच्चे के जीवन से संबंधित फ़ैसलों का कारण बनती है। जब जन्म से ही विवेक से दुश्मनी का पाठ पढ़ाया जाता रहा हो, तो फिर चालाक लोगों के लिए उन्हें बरगलाना कोई मुश्किल काम नहीं है।

अप्रैल और मई तक कोरोना के समाप्त होने की भविष्यवाणी करने के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 21 दिन के लॉकडाउन लागू करने की भी भूमिका थी, जिसके बारे में स्वयं प्रधानमंत्री का दावा था कि कोरोना के विरुद्ध लड़ाई इन 21 दिनों में जीत ली जाएगी। इन भविष्यवाणियों का मकसद यह साबित करना भी था कि नरेंद्र मोदी महान भविष्यद्रष्टा, वैज्ञानिक और महामानव (और कुछ की नज़रों में अवतार) हैं। लॉकडाउन की पहली घोषणा 25 मार्च से 14 अप्रैल के लिए की गई थी। इसलिए यह दावा किया जाने लगा कि लॉकडाउन के दौरान वायरस का प्रकोप कम होने लगेगा और 14 अप्रैल तक यह महामारी समाप्त हो जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और प्रधानमंत्री को लॉकडाउन की अवधि तीन मई तक बढ़ानी पड़ी। अप्रैल का महीना भी समाप्त हो गया और महामारी के कम होने के कोई आसार दुनिया में कहीं भी नज़र नहीं आए। भारत में भी यह महामारी लगातार फैलती चली गई।

जब 22 मार्च को प्रधानमंत्री द्वारा जनता कर्फ़्यू लागू किया गया और उसी दिन शाम पांच बजे ताली-थाली बजाने का आह्वान किया गया, तो मोदी भक्तों ने यह प्रचारित किया कि इससे वायरस समाप्त हो जाएगा क्योंकि सामाजिक दूरी के कारण वायरस को फैलने के लिए संपर्क सूत्र नहीं मिलेगा और ताली-थाली की आवाज़ से जो ऊर्जा पैदा होगी उससे वायरस दुम दबाकर भाग खड़ा होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वायरस से संक्रमित रोगियों की संख्या बढ़ती गई। इसके बाद प्रधानमंत्री ने एक नया मंत्र दिया कि सारे भारतवासी पांच अप्रैल को रात नौ बजे सारी बत्तियां बंद करके नौ मिनट के लिए मोमबत्ती और दीये जलाएं। इसको लेकर यह दावा भी किया गया कि 22 मार्च के कर्फ़्यू से 95%
वायरस खत्म हो गए थे, लेकिन जो 5% रह गए थे, वे भी 5 अप्रैल को मोमबत्ती और दिया जलाने से जो ऊर्जा पैदा होगी उससे समाप्त हो जाएंगे। यह दावा करने वालों ने यह बताना ज़रूरी नहीं समझा कि उन्होंने यह कैसे जाना कि 95% वायरस खत्म हो गए हैं। कुछ ज्योतिषियों द्वारा यह दावा किया गया कि 9 की संख्या का खास महत्त्व है। 5 अप्रैल (पांचवीं तारीख़ + चौथा महीना) की संख्या भी 9 होती है, फिर 9 बजे और 9 मिनट में भी 9 की संख्या है। यह कहा गया कि ज्योतिष के अनुसार यह इतना विशिष्ट काल है कि उस अवधि में दीये और मोमबत्ती जलाने से जो शक्ति पैदा होगी, वह वायरस को खत्म कर देगी। प्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट के. के. अग्रवाल ने भी ‘योग वशिष्ठ’ का हवाला देकर सामूहिक चेतना पैदा होने से लोगों की रोग से लड़ने की क्षमता में वृद्धि होगी, ऐसा दावा किया। लेकिन 130 करोड़ लोगों द्वारा दीया जलाने से जिस ऊर्जा के पैदा होने का दावा किया गया, ऐसा दावा करने वाले भूल गए कि दिन में सूर्य की रोशनी में जितनी ऊर्जा और प्रकाश पैदा होता है, उतनी ऊर्जा 130 करोड़ ही नहीं, 130 अरब दीये एक साथ जलाने से भी पैदा नहीं हो सकती। अगर ऐसा होता तो वायरस तो दिन के समय खत्म हो जाना चाहिए था, जबकि आंकड़े बताते हैं कि जून के महीने में भी महामारी लगातार बढ़ती रही, जबकि दिन का तापमान 40-45° तक पहुंच चुका था। 

कोरोना वायरस से सम्बन्धित एक और दावा तुलसीदास की ‘रामचरित मानस’ के आधार पर किया जा रहा है। दावा यह है कि गोस्वामी तुलसीदास ने 400 साल पहले इस महामारी के फैलने की भविष्यवाणी कर दी थी। ‘रामचरितमानस’ के उत्तरकांड के दोहा संख्या 120 और 121 और उनके बीच की चौपाइयों के आधार पर यह दावा किया गया है। इस दावे के अनुसार, “रामायण के दोहा नंबर 120 में लिखा है कि जब पृथ्वी पर निन्दा बढ़ जायेगी, तब चमगादड़ अवतरित होंगे और चारों ओर उनसे संबंधित बीमारी फैल जाएगी और लोग मरेंगे। दोहा नंबर 121 में लिखा है -- एक बीमारी जिसमें नर मरेंगे, उसकी सिर्फ़ एक दवा है प्रभु भजन, दान और समाधि में रहना यानी लॉकडाउन”। मानस की जिन चौपाइयों और दोहों का उपर्युक्त अर्थ निकाला गया है, वे निम्नलिखित हैं :

सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहिं।।
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहि सब लोगा।।
मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु  सूला।।
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।
प्रीति करही जो तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।।
विषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।
ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।।
पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कटुलाई।।
अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।।
तृस्ना उदरबुद्धि अति भारी। त्रिविधि ईषना तरुन तिजारी।।
जुग विधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहं लगि कहां कुरोग अनेका।।
एक व्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु व्याधि।
पीड़हिं संतत जीव कहुं सो किमि लहै समाधि।। 121 (क)।।
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान।। 121 (ख) ।।

‘रामचरितमानस’ के दोहे 120 और 121 से जो अर्थ निकाला गया है, दरअसल वह दोहा 120 के बाद 
की कुछ चौपाइयों और 121 के दो दोहों से निकाला गया है। इसके लिए चमगादड़ और समाधि शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। चमगादड़ को कोरोना वायरस और समाधि का अर्थ लॉकडाउन मान लिया गया है जो जानबूझकर फैलाया गया अनर्थ है। ‘नारद संहिता’ की तरह ‘रामचरितमानस’ कोई ऐसा ग्रंथ नहीं है जो सामान्य नागरिकों के लिए अपरिचित हो। हां, यह अवश्य है कि ‘मानस’ का भक्तिभाव से पाठ करने वाले भी उसमें दिये गये अर्थ को समझकर उसका पाठ करते हों, इसकी संभावना कम ही है। वे तो यह मानकर चलते हैं कि  धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने और सुनने से ही उनको मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी। उसको समझने की चेष्टा करनी भी नहीं चाहिए। इस मानसिकता का ही नतीजा है कि धार्मिक ग्रंथों का हवाला देकर लोगों को गुमराह करने का काम पहले पंडित लोग किया करते थे, आजकल राजनीतिक लाभ के लिए सांप्रदायिक और तत्त्ववादी लोग करते हैं। धर्मभीरू और अंधविश्वासी लोगों को आप सही अर्थ बताएंगे भी तो वे इसे नहीं मानेंगे। इसलिए उपर्युक्त चौपाइयों और दोहों का जो अर्थ गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित ‘मानस’ में दिया गया है, उसे उद्धृत करना ही उपयुक्त होगा।

*‘मानस’ के उपर्युक्त अंश का गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित ग्रंथ में दिया अनुवाद :*

“जो  मनुष्य सबकी निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं। सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ़ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है। यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ़) प्रीति कर लें (मिल जाएं), तो दुःखदायी सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है। ममता दाद है, ईर्ष्या (डाह) खुजली है,
हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गल कंठमाला या घेंघा रोग है), पराये सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है और मन की कुटिलता ही कोढ़ है। अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गांठ का) रोग है। दंभ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएं प्रबल तिजारी हैं। मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहां तक कहूं”।

दोहों के अर्थ -- “एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करेॽ
“नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियां हैं, 
परंतु हे गरुड़ जी! उनसे ये रोग नहीं जाते”।

स्पष्ट है कि मानस के जिस अंश में कोरोना वायरस को खोज लिया गया, वह जनता के अज्ञान और अन्धविश्वास का लाभ उठाकर उस पर जबरन थोपे गये अर्थ का परिणाम है, जिसका दूर-दूर तक तुलसीदास की लिखी पंक्तियों से कोई संबंध नहीं है। दरअसल बीमारियों से जो रूपक बनाया है, उसका संबंध मनुष्य के उन मनोभावों से है, जिन्हें धार्मिक और नैतिक दृष्टि से मनुष्य की कमज़ोरियां माना जाता रहा है। तुलसीदास एक ब्राह्मणवादी भक्त कवि थे और अपनी मान्यताओं के अनुसार उन्होंने जो ठीक समझा, लिखा। वे न ज्योतिष थे और न ही भविष्यद्रष्टा। उनके लिखे ग्रंथों के मनमाने 
अर्थ निकालने वाले तुलसीदास के लेखन का अपने राजनीतिक हित में इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि
उन्हें मालूम है कि इससे राम और तुलसीदास में आस्था रखने वालों को आसानी से बेवकूफ़ बनाया जा सकता है। और उनकी इसी अंध आस्था का इस्तेमाल उनमें सांप्रदायिक नफ़रत और घृणा भरने के लिए भी किया जा सकता है। जैसा कि हम देख रहे हैं कि इस तरह की बातों में यकीन करने वाले ही यह सहज ही मान लेते हैं कि भारत में कोरोना मुसलमानों के द्वारा फैल रहा है। इसके बाद उनके  विरुद्ध हिंसा उकसाना कोई मुश्किल काम नहीं है।

चार चरणों के (68 दिन के) लॉकडाउन की असफलता के बाद प्रधानमंत्री ने कोरोना के खात्मे का दावा करना बंद कर दिया था और यह कहना शुरू कर दिया था कि कोरोना के साथ ही जीने की आदत डालनी होगी। ज़ाहिर है कि इसने लोगों के डर को और बढ़ा दिया। इसी डर ने लोगों को टोने-टोटके की तरफ़ धकेलना शुरू कर दिया। लगातार इस तरह की खबरें आ रही हैं कि कोरोना के प्रकोप से बचने के लिए लोग कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं, जंत्र-मंत्र और झाड़फूंक करने में लगे हैं, यहां तक कि जानवरों से लेकर मनुष्य तक की बलि दी जाने लगी है।

उड़ीसा के कटक ज़िले के एक पुजारी ने कोरोना वायरस को खत्म करने के लिए एक मनुष्य की बलि दे दी। उसका कहना था कि ऐसा करने का आदेश स्वयं भगवान ने सपने में आकर दिया था। नरसिंहपुर थाना क्षेत्र के बहुड़ा गाँव के ब्राह्मणी देवी मन्दिर में सरोज कुमार प्रधान नामक 52 वर्षीय व्यक्ति की बलि चढ़ाई गई। इससे कम भयावह घटना नहीं है जब झारखंड के कोडरमा ज़िले में कोरोना को भगाने के लिए 400 बकरों की बलि दे दी गई। कोडरमा ज़िले के चंदवारा प्रखंड के अन्तर्गत ग्राम उरवां के देवी मन्दिर में कोरोना को शांत करने के लिए हवन, पूजन और आरती का आयोजन हुआ और उसके
बाद वहां मौजूद लोगों ने देवी माता को प्रसन्न करने के लिए 400 बकरों की बलि चढ़ा दी। अन्धविश्वास के मामले में बिहार भी पीछे नहीं है। जहां इस कहानी का ज़ोरों से प्रचार हो रहा है कि गायें चराने गईं
दो औरतों के सामने एक गाय अचानक औरत में बदल गई। इस चमत्कार से डरकर जब औरतें वहां से भागने लगीं तो, उस औरत ने उनको रोका और बताया कि वह कोरोना माई है, यानी कोरोना की देवी। देवी ने उन औरतों को कहा कि वह लोगों से रुष्ट है और अगर माई को प्रसन्न करना है, तो औरतें मेरी पूजा करें। देवी ने पूजा की विधि भी बताई कि एक गड्ढा खोदकर पहले नौ लड्डू, नौ फूल, नौ लौंग से उसकी पूजा करें और बाद में पूजा की सारी सामग्री गड्ढे में दफ़ना कर गड्ढे को बंद कर दें। इससे कोरोना भी दफ़न हो जाएगा। इसके बाद बिहार में जगह-जगह औरतें झुंड बनाकर बताई गई विधि के अनुसार पूजा करने लगीं, यह मानकर कि इससे उन्हें कोरोना से मुक्ति मिल जाएगी। अन्धविश्वास की एक और घटना मध्यप्रदेश के रतलाम ज़िले में हुई जहां लोगों के हाथ चूमकर कोरोना का इलाज करने वाले तांत्रिक असलम बाबा उर्फ़ अनवर शाह कोरोना के संक्रमण से न केवल खुद मर गए बल्कि अपने कई भक्तों को भी संक्रमण से ग्रसित कर गए। अन्धविश्वास की ये कुछ घटनाएं हैं जिनकी अख़बारों में रिपोर्टिंग हुई है। न मालूम देश में कहां-कहां किस-किस तरह के टोने-टोटके किये 
जा रहे होंगे। चेचक की वेक्सीन द्वारा पूरे देश को कई दशकों पहले चेचक-मुक्त किया जा चुका है। इसके बावजूद आज भी पूरे उत्तर भारत में चेचक की देवी शीतला माता की पूजा की जाती है, उसको प्रसन्न रखने के लिए व्रत-उपवास रखे जाते हैं और हर साल होने वाले मेलों में लाखों लोगों की भीड़ जमा होती है। 

यह हमारे देश के पिछड़ेपन  की निशानी है कि संविधान में वैज्ञानिक चेतना को जनता में प्रसारित करने की बात शामिल किये जाने के बावजूद अन्धविश्वास में कमी नहीं आई है, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़कर सभी राजनीतिक पार्टियां लोगों को अन्धविश्वासों के इसी अंधेरे में कैद रखना चाहती हैं। शिक्षा का भी ढांचा इस तरह का है कि विज्ञान की शिक्षा भी वैज्ञानिक चेतना पैदा नहीं करती, बल्कि वे विज्ञान के सिद्धांतों को ज्ञान की बजाय कौशल की तरह ग्रहण करते हैं। इस तरह विज्ञान उनके जीवन को सोच के स्तर पर बिल्कुल भी प्रभावित नहीं कर पाता। दरअसल वैज्ञानिक चेतना फैलाने के लिए व्यापक जन-आंदोलनों की ज़रूरत है, हालांकि उसमें कई तरह के खतरे भी निहित हैं। लोगों में इन अंधविश्वासों के विरुद्ध जन-जागरण करने वाले महान विवेकवादी नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम. एम. कलबुर्गी और गोरी लंकेश की हत्याएं पिछले सात-आठ सालों में ही की गईं हैं। जो ताकतें इस देश को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाहती है, और जो अभी सत्ता पर काबिज़ हैं, वही यह भी चाहती हैं कि जनता में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार न हो क्योंकि जहां वैज्ञानिक चेतना पनपेगी, वहां सांप्रदायिक राष्ट्रवाद अपनी जड़ें नहीं जमा सकता।

मोबाइल : 9810606751

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