Wednesday, 29 July 2020

छपाक

छपाक 

मेरे इस लेख की भाषा आम बोलचाल की भाषा है, यानी गूढ़ नहीं है। हो सकता है कि मेरे विचार भी इतने ठोस न हों क्योंकि मैं सोचती हूँ कि विचारों के ठोस होने से हम अपने इर्द-गिर्द दीवार बना लेते हैं और विश्लेषण की क्षमता खो बैठते हैं। पर विचारों के भाव काफ़ी गहरे हैं।
मैं अभ्यस्त लेखक नहीं हूँ पर कवि हृदय रखती हूँ और शायद इसीलिए आगे आप जो पढ़ेंगे, यह कोई फ़िल्म समीक्षा नहीं है बल्कि एक फ़िल्म को देखते हुए, देखने के बाद मुझ पर और मेरे अंदर क्या गुज़रा वो साझा कर पाएँगे।

छपाक का ट्रेलर देख के ही मैं अंदर तक उस चीख से हिल चुकी थी। दीपिका पादुकोण जो मुख्य किरदार मालती निभाती हैं, इतना ज़्यादा प्रभाव छोड़ता है कि मैं बेसब्री से फ़िल्म का इंतज़ार करती हूँ। हालाँकि मैंने लक्ष्मी अग्रवाल (जिनसे यह किरदार प्रेरित था) के बारे में काफ़ी पढ़ा था, उनसे जुड़ी एक-दो डॉक्युमेंट्रीज़ देखी हुई थीं और साथ ही उनका एक बहुत प्रेरक टेड टॉक सुना हुआ था। मैं बस यह सोचती रही कि एक फ़िक्शन फ़िल्म के रूप में हम इसमें ऐसा क्या नया देख लेंगे। और फिर जनवरी में फ़िल्म रिलीज़ हुई और मैं इसे बड़े पर्दे पर देखने गई।

फ़िल्म एक विरोध-प्रदर्शन से शुरू होती है और स्क्रीन पर यह देखते ही हमारे मस्तिष्क में जेसिका लाल, निर्भया और लक्ष्मी अग्रवाल जैसे सभी केस आने लगते हैं। एक भ्रम होता है कि फ़िल्म शायद अब किरदार के जीवन का डॉक्युमेंट बन जाएगी। पर जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है, यह एहसास होता है कि फ़िल्म सिर्फ़ मालती के बारे में नहीं है बल्कि मालती के माध्यम से हमें उस दुनिया से परिचित करवाती है जोकि हमारे इर्द-गिर्द है, हमें मालूम है मगर हम इस दुनिया को नज़रंदाज़ करते हैं। फ़िल्म मोटे तौर पर भले ही मालती की नज़र से उसकी आपबीती और जीवनसंघर्ष की गाथा लगती हो मगर असल में फ़िल्म के स्क्रीनप्ले को समझें तो वह दिखाई देता है जो मालती की कहानी के बाहर भी घट रहा है और इससे जुड़ा है। इस कहानी के विषय के कारण शायद हम बार-बार मालती के संग कहानी के दृष्टिकोण में गोते लगाते रहते हैं। कभी सभी कुछ मालती की दृष्टि देखते हैं, कभी समाज के उस व्यक्ति की जो सब कुछ देखते हुए अनदेखा करने या देख कर कुछ न कर पाने के कारण अपराध-बोध महसूस करता है।

अतिका चौहान के लेखन में एक निर्णय नज़र आता है कि एसिड गिरा के किसी की सूरत बिगाड़ना या किसी को चोट पहुंचाना अपने आप में एक घटिया अपराध है। इस अपराध में आप यह गुंजाइश नहीं देख सकते कि ऐसा करने वाले की मंशा क्या रही होगी। फ़िल्म भी इस बात पर बिलकुल समय न लगाते हुए, हमें मालती के साथ होने वाले जघन्य अपराध का होना दर्शाती है। जिसका कारण साफ़ है कि जो लोग ऐसे अपराधों को अख़बार की सुर्खी की तरह देखते हैं, वे भी अंदर तक हिल जाएँ। उन्हें यह एहसास हो कि यह कितना दर्दनाक और भयानक हो सकता है। उस पीड़ा को उतना ही तीव्र बनाने के लिए इस दृश्य और एसिड से जले चेहरे और शरीर को बार-बार दिखाना कितना अहम हो जाता है। फिर भी ये सब बिलकुल सेंसेशनल जर्नलिज़्म जैसा नहीं लगता और  वे अखबार की सुर्खियां जिन्हें हमने अपने रोज़ के जीवन में नज़रअंदाज़ कर दिया है, वापिस आँखों के आगे तैरने लगती हैं। न केवल कहानी बल्कि किरदारों को भी सोचा-समझा स्क्रीनस्पेस दिया गया है। आप कहानी के मूल भाव से भटकते नहीं। मालती की कहानी में सिर्फ़ मालती नहीं हो सकती; उसकी दुनिया, जिसमें वह रहती है, वह समाज, पड़ोस, परिवार, यहां तक कि खुदगर्ज़ पर फिर भी मददगार, सभी तरह के किरदारों की मौजूदगी है। कहानीकार ने बहुत सही माप-तोल के साथ सारे चरित्र लिखें हैं; फिर चाहे मालती का कन्नी काट जाने वाला दोस्त है, उसका पिता जो शराब की लत से मजबूर पर अच्छा पिता है, उसका भाई जो खुद उम्र के उस पड़ाव पर है जहां बच्चा पारिवारिक स्थितियों को समझने की क्षमता नहीं रखता बल्कि असहाय महसूस करने लगता है और इस सब पर उसकी कुंठा निकालती माँ। फिर घटना के बाद मिलने वाले सब किरदार, जैसे -- मीनाक्षी जो मालती का पता निकाल अमोल को उस तक पहुंचाती है पर इसमें शुरुआत में उसका खुद का स्वार्थ निहित होता है, अमोल जो फ़िल्म का हीरो बिलकुल नहीं है (बावजूद इसके कि वह एसिड-पीड़ितों के लिए संघर्ष करने की एक कोशिश से जुड़ा है), वकील जिन्हें इस केस की बारीकियां समझ आती हैं और एक अन्य किरदार जोकि शीराज़ जमशेदजी का है जिनके यहां मालती की माँ काम करती है, समाज के उस वर्ग के लोग हैं जो शायद मददगार साबित होने की हर संभव कोशिश करते हैं पर अपराधबोध और जागरूकता दोनों के ही दबाव में वे ऐसा कर रहे होते हैं, एक लाइन के बाद शायद वे भी सिस्टम में ट्रैप्ड होते हैं। कहने का अर्थ यह है कि सभी किरदार सरल, सपाट नहीं हैं, उनकी अपनी त्रुटियाँ हैं। वे बहुआयामी हैं, इसीलिए सच्चे हैं और यथार्थ से मेल खाते हैं। ये इस लेखन की खूबी है।

एक और बात जो विचारवाद और यथार्थ के बीच का अहम चित्रण है -- सभी पुरुष किरदारों के दृश्य। कैसे बिना मालती की कहानी को भटकाए या उस पर हावी हुए हम इन किरदारों के माध्यम से पुरुष मनोवृत्ति की अलग-अलग झलक देख पाते हैं। जैसे कि एक दृश्य में हम देखते हैं कि मालती की वकील अर्चना अपनी सहकर्मी के साथ केस पर विचार कर रही होती है और जब उसकी बेटी अपने बाल बनाने को लेकर उसका ध्यान बंटाती है तो कैसे पति आनंद बेटी को दूसरी तरफ़ ले जाकर अपनी पत्नी और उसकी सहकर्मी को काम करने का स्पेस देता है। अव्वल तो यह एक छोटी-सी बात है पर फिर भी दर्शक की तरह मेरे मन में रह जाती है। शायद इसलिए कि मैंने अपनी माँ को हमें संभालते, ऑफिस के कार्य करते और घर के कार्य करते पाया है और पिता को सिर्फ़ ऑफिस के, जब तक कि वे दफ़्तर से रिटायर नहीं हुए। शायद आगे की पीढ़ी को यह अचंभित न करे क्योंकि इन मुद्दों पर अब बातचीत होने लगी है पर मेरी पीढ़ी तक पुरुष को घर का "अर्थ" सँभालते और महिला को घर और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सँभालते देखा गया है। यह बात और है कि अपवाद सब जगह होते हैं। ख़ैर, फ़िल्म पर आएं तो इस तरह के काफ़ी मोमेंट्स देखने को मिलते हैं जिनमे जेंडर पॉलिटिक्स कह लें या इक्वालिटी जिसकी हम चाह रखते हैं, उसके भिन्न प्रारूप बाक़ायदा देखने को मिलते हैं।

फ़िल्म के कुछ संवाद भी आपको सोचने पर मजबूर करते हैं और शायद फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी हमारे साथ रह जाते हैं, जैसे कि "नाक नहीं हैं, कान नहीं हैं झुमके कहाँ लटकाऊँगी!" यह सुनने के बाद मुझे महसूस हुआ कि सिर्फ क्षणिक दर्द या सर्जरी तक का दर्द नहीं है, यह उम्र-भर का दर्द है जो एसिड फेंकने वाला तो क्या ही सोचता होगा, हम भी नहीं सोचते थे। फ़िल्म मनोस्थिति और दर्द से गुज़रने वाली मनोस्थिति पर भी बात करती है। एक और संवाद है -- "कितना अच्छा होता अगर एसिड बिकता ही नहीं... मिलता ही नहीं तो... फिंकता भी नहीं।" इसे सुनने के बाद हम सब सोचने को मजबूर होंगे और आगे फ़िल्म में इस एसिड की बिक्री को लेकर काफ़ी बात होती है जिससे हमें समझ में आता है कि इसके बंद होने की ज़रूरत क्यों है; केवल इसका नियंत्रण काफ़ी क्यों नहीं; इसके लिए लड़ने वाली संस्थाओं या ग्रुप्स को हम आज तक गंभीरता से क्यों नहीं ले पाए। एक और बहुत खूबसूरत संवाद है, "उन्होंने मेरी सूरत बदली है... मेरा मन नहीं।" यह उस विजयी क्षण में बोला गया जब मालती पहली बार अपने खोये आत्मविश्वास को वापिस पाती है। 

फ़िल्ममेकिंग की अगर बात करें तो मेघना गुलज़ार ने इससे पहले फ़िल्म तलवार और राज़ी को जिस तरह का निर्देशन दिया, यह फ़िल्म उनके मुक़ाबले थोड़ी अलग लगी। यह फ़िल्म शायद यथार्थ के करीब रहने और मुद्दे से न भटकने की एक कोशिश बन जाती है। इसी कारण अंत में ऐसा लगता है कि सब कुछ पूरा तो होता है, फिर चाहे एसिड विक्टिम्स या (जैसा कि फ़िल्म देखने के बाद कहना चाहूंगी) एसिड वारियर्स की लड़ाई हो या सभी चरित्रों का जो एक वृत्त बनता है, वह हो। बीच में फ़िल्म अमोल और मालती के साथ कहीं खोने लगती है पर बहुत जल्द अपने असली मोड़ पर लौट आती है। ख़ैर, ऐसा लग रहा है मानो फ़िल्म पर बात करते-करते मैं समीक्षा करने लगी और इसी से तो मैं बचना चाह रही थी पर बचना मुश्किल है क्योंकि कुछ बातें उल्लेखनीय हैं तो सांझा करनी ही होंगी ।

फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाने वाले एक्टर्स जो प्रसिद्ध हैं ही, अपनी-अपनी भूमिका में बहुत सटीक थे। बाकी सभी चरित्रों ने भी अपनी भूमिका ठीकठाक निभाई पर लेख के अंत तक पहुँचने से पहले मैं यहां बब्बू जोकि अपराधी लड़के का किरदार है, उसे निभाने वाले विशाल दहिया के लुक एवं स्टान्स की दाद दूँगी। उन्होंने बहुत लिमिटेड स्क्रीन टाइम में खुद हमारे अंदर किरदार के प्रति जितनी घृणा पैदा करनी थी, वह की। साथ ही मैं अमोल के दोस्त के किरदार में रहे देवास दीक्षित को भी इस फ़िल्म के लिए शुभमकनाएं दूँगी। ये नए और युवा एक्टर्स एक ऊर्जावान टैलेंट से भरपूर हैं और इन दोनों ने अपने-अपने रोल में रहते हुए अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया। अपने फ़ील्ड में आमतौर पर एक्टर्स के साथ काम कर के मैंने यह महसूस किया है कि कम स्क्रीन टाइम में भी अपनी परफॉर्मेंस बखूबी निभा देना सबके बस की बात नहीं। पर यहां इन दोनों के अलावा अर्चना के पति की भूमिका में आनंद तिवारी ने भी अपना किरदार बड़ी सरलता से निभाया है।

यह फ़िल्म बहुत अच्छी, बुरी, कम अच्छी, देखने लायक है या नहीं से परे है और फिर फ़िल्म तो एक ऐसा क्राफ़्ट है जो बन जाने के बाद जितनी बार जितने लोगों द्वारा देखी जाए, और ज़्यादा आर्ट साबित होती जाती है। यह फ़िल्म काफ़ी साहसी है क्योंकि यह एसिड विक्टिम्स या वारियर्स की त्रासदी नहीं है बल्कि उनकी लड़ाई है और इसीलिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जिस दौरान यह रिलीज़ हुई, उस दौरान देश में स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ हुई हिंसा को लेकर एक जानीमानी यूनिवर्सिटी जे एन यू में विरोध-प्रदर्शन चल रहा था बल्कि देश-भर में ये प्रदर्शन शांतिपूर्वक किए जा रहे थे। मालती का किरदार निभाने वाली और इस फ़िल्म की प्रोड्यूसर दीपिका ने छात्रों के समर्थन में जे एन यू जा कर समर्थन दिया जिसके लिए काफ़ी संख्या में लोगों ने उनकी इस फ़िल्म को बॉयकॉट करने की भी ठानी। देश में किसी सेलिब्रिटी के लिए अपना स्टैंड व्यक्त करना समीक्षा से ज़्यादा मत-अभिमत का मुद्दा बन जाता है। कोई इसके परिणाम की फ़िक्र किये बिना यदि ऐसा कर ले तो वह हिम्मतेक़ाबिल भी कहलाता है जोकि अपने आप में एक हास्यास्पद स्थिति है। ख़ैर, दीपिका ने यह सिद्ध किया कि जो क़िरदार वह फ़िल्म में निभा रहीं हैं, उसके मनोभाव से वह पूरी तरह न्याय करती हैं, आखिर वह किरदार भी एक योद्धा का है जो बिना डरे अपने अस्तित्व और खुल के जीने के हक़ की लड़ाई लड़ने का मत रखती है पूरी दुनिया के सामने।

शायद कुछ फ़िल्में अपनी संरचना से ज़्यादा विषय, अंतर्निहित विचारों और उससे जुड़े लोगों की वजह से महत्त्वपूर्ण होती हैं। ऐसी फ़िल्में बनना और दर्शकों तक पहुँचना और भी ज़रूरी हो जाता है।

-- दीप्ति खुराना

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