अंतरसंबंध ।
संपूर्णता में इस ब्रह्मांड का न ही कोई प्रस्थान बिंदु है और न ही कोई गंतव्य स्थान। यह दोनों सिरों पर समान रूप से खुला है। समय असीमित है। यदि इसकी कोई सीमा होती तो इसका कहीं आरंभ भी होता। यदि आरंभ होता तो उत्पत्ति का प्रश्न उभरता। यदि उत्पत्ति की बात होती तो उत्पत्तिकर्ता भी होता ।
प्रस्थान का प्रश्न ब्रह्मांड पर लागू नहीं होता। हां, यह प्रश्न ब्रह्मांड में घटित होने वाली सभी घटनाओं व प्रक्रियाओं पर समान रूप से लागू होता है। क्योंकि इन घटनाओं या प्रक्रियाओं की इसी ब्रह्मांड में उत्पत्ति है और सीमा है। हम ब्रह्मांड की कोई सीमा तय नहीं कर सकते ।हम इसकी आयु तय नहीं कर सकते। यह अनादि है ।यह अनंत है और हमेशा रहेगा भी ।अपने कारण और परिणाम के लिए यह स्वयम जिम्मेवार है।
लेकिन जहां स्वतंत्र रूप में स्वयम अपने आप में कुछ नहीं है। हर वस्तु ,घटना या प्रक्रिया एक -दूसरे से जुड़ी हुई है। यह अंतहीन श्रृंखलाओं का अंतहीन सिलसिला है। इस श्रृंखला में अभी तक कोई ब्रेक नहीं आया है। अर्थात यह श्रृंखला ही है जो इस ब्रह्मांड को जोड़े हुए है। यदि हम अपनी एक अंगुली भी हिलाते हैं तो इसका अर्थ है कि हम इस पूरे ब्रह्मांड को डिस्टर्ब कर रहे हैं। इस श्रृंखला को हम ब्रह्मांड के संबंधों का नाम देते हैं। इन सभी अंतरसंबंधों का अस्तित्व पूर्ण रुप से स्वतंत्र नहीं है अपितु एक दूसरे के सापेक्ष है। अकार्बनिक प्रकृति में ये संबंध यांत्रिक ,भौतिक या रासायनिक किसम के हैं ।इनके साधन आपसी संपर्क या विशेष प्रकार के क्षेत्र चाहे वे चुंबकीय हो या गुरुत्वीय या कोई और हों , इनमें थोड़ा सा भी बदलाव सभी को प्रभावित करता है। लेकिन कार्बनिक दुनिया में जिसमें जैविक व समाज आते हैं ये सम्बन्ध ज्यादा जटिल हैं। जैसे-जैसे जैविक संसार जटिल होता जाता है समाज विकसित होता जाता है ये संबंध और भी जटिल होते जाते हैं ।यहां ये संबंध विचार या चेतना के रूप में प्रभावशाली होते हैं। यहां इन संबंधों के कुछ रूप इस प्रकार हैं – स्थान अर्थात दूरी, स्पर्श, कारणता व प्रभाव, आवश्यकता एवं संयोग, नियम संचालित ,फौरी, आंतरिक व बाहरी, गतिज एवं स्थितिज एवं फीडबैक आदि -आदि। इन सभी संबंधों का अपना आधार है। अर्थात इन संबंधों के साथ कुछ- न- कुछ जुड़ा हुआ है ।ये केवल कहने के लिए संबंध नहीं है। यही विश्व की पदार्थीय एकता है। और दर्शन की भाषा में इसे ही सार्वभौमिक अस्तित्व की गारंटी कहा जाता है ।
संज्ञान प्रक्रिया में सबसे पहले हमें वस्तुएं जैसी भी है दिखाई देती हैं या महसूस होती हैं। इन पर कौन-कौन से संबंध किस -किस प्रकार के कार्य कर रहे हैं यह समझने के लिए नजर पैनी करनी पड़ती है। इन सभी पहलुओं को समझे बिना हम यथार्थ की समझ तक नहीं पहुंच सकते। इस पर भी विडंबना यह है कि जब कोई वस्तु, घटना या प्रक्रिया थोड़ी बहुत समझ की पकड़ में आती है यह अपना चरित्र बदल चुकी होती है। हमारी समझने वाली नजर भी बदल चुकी होती है। और जिस उद्देश्य के लिए हम समझना चाहते थे वह अपने स्थान से हिल चुका होता है। इसलिए यथार्थ हमेशा आंशिक रूप में ही पकड़ में आता है।
वेद प्रिय
संपूर्णता में इस ब्रह्मांड का न ही कोई प्रस्थान बिंदु है और न ही कोई गंतव्य स्थान। यह दोनों सिरों पर समान रूप से खुला है। समय असीमित है। यदि इसकी कोई सीमा होती तो इसका कहीं आरंभ भी होता। यदि आरंभ होता तो उत्पत्ति का प्रश्न उभरता। यदि उत्पत्ति की बात होती तो उत्पत्तिकर्ता भी होता ।
प्रस्थान का प्रश्न ब्रह्मांड पर लागू नहीं होता। हां, यह प्रश्न ब्रह्मांड में घटित होने वाली सभी घटनाओं व प्रक्रियाओं पर समान रूप से लागू होता है। क्योंकि इन घटनाओं या प्रक्रियाओं की इसी ब्रह्मांड में उत्पत्ति है और सीमा है। हम ब्रह्मांड की कोई सीमा तय नहीं कर सकते ।हम इसकी आयु तय नहीं कर सकते। यह अनादि है ।यह अनंत है और हमेशा रहेगा भी ।अपने कारण और परिणाम के लिए यह स्वयम जिम्मेवार है।
लेकिन जहां स्वतंत्र रूप में स्वयम अपने आप में कुछ नहीं है। हर वस्तु ,घटना या प्रक्रिया एक -दूसरे से जुड़ी हुई है। यह अंतहीन श्रृंखलाओं का अंतहीन सिलसिला है। इस श्रृंखला में अभी तक कोई ब्रेक नहीं आया है। अर्थात यह श्रृंखला ही है जो इस ब्रह्मांड को जोड़े हुए है। यदि हम अपनी एक अंगुली भी हिलाते हैं तो इसका अर्थ है कि हम इस पूरे ब्रह्मांड को डिस्टर्ब कर रहे हैं। इस श्रृंखला को हम ब्रह्मांड के संबंधों का नाम देते हैं। इन सभी अंतरसंबंधों का अस्तित्व पूर्ण रुप से स्वतंत्र नहीं है अपितु एक दूसरे के सापेक्ष है। अकार्बनिक प्रकृति में ये संबंध यांत्रिक ,भौतिक या रासायनिक किसम के हैं ।इनके साधन आपसी संपर्क या विशेष प्रकार के क्षेत्र चाहे वे चुंबकीय हो या गुरुत्वीय या कोई और हों , इनमें थोड़ा सा भी बदलाव सभी को प्रभावित करता है। लेकिन कार्बनिक दुनिया में जिसमें जैविक व समाज आते हैं ये सम्बन्ध ज्यादा जटिल हैं। जैसे-जैसे जैविक संसार जटिल होता जाता है समाज विकसित होता जाता है ये संबंध और भी जटिल होते जाते हैं ।यहां ये संबंध विचार या चेतना के रूप में प्रभावशाली होते हैं। यहां इन संबंधों के कुछ रूप इस प्रकार हैं – स्थान अर्थात दूरी, स्पर्श, कारणता व प्रभाव, आवश्यकता एवं संयोग, नियम संचालित ,फौरी, आंतरिक व बाहरी, गतिज एवं स्थितिज एवं फीडबैक आदि -आदि। इन सभी संबंधों का अपना आधार है। अर्थात इन संबंधों के साथ कुछ- न- कुछ जुड़ा हुआ है ।ये केवल कहने के लिए संबंध नहीं है। यही विश्व की पदार्थीय एकता है। और दर्शन की भाषा में इसे ही सार्वभौमिक अस्तित्व की गारंटी कहा जाता है ।
संज्ञान प्रक्रिया में सबसे पहले हमें वस्तुएं जैसी भी है दिखाई देती हैं या महसूस होती हैं। इन पर कौन-कौन से संबंध किस -किस प्रकार के कार्य कर रहे हैं यह समझने के लिए नजर पैनी करनी पड़ती है। इन सभी पहलुओं को समझे बिना हम यथार्थ की समझ तक नहीं पहुंच सकते। इस पर भी विडंबना यह है कि जब कोई वस्तु, घटना या प्रक्रिया थोड़ी बहुत समझ की पकड़ में आती है यह अपना चरित्र बदल चुकी होती है। हमारी समझने वाली नजर भी बदल चुकी होती है। और जिस उद्देश्य के लिए हम समझना चाहते थे वह अपने स्थान से हिल चुका होता है। इसलिए यथार्थ हमेशा आंशिक रूप में ही पकड़ में आता है।
वेद प्रिय
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